चन्द्रकोट का श्राप: प्राचीन भारत की भूतिया कहानी - भाग 2

🕯️चन्द्रकोट का श्राप — भाग 2: तंत्र का जागना


जहाँ रौशनी हार जाए

अर्जुन की मशाल बुझ चुकी थी, लेकिन मंदिर के भीतर घना काला प्रकाश मानो उसकी आँखों में उतर रहा था।
वह पीछे हटना चाहता था, मगर उसके पाँव किसी अदृश्य ताकत ने ज़मीन में गाड़ दिए थे।



मूर्ति के होंठ धीरे-धीरे हिलने लगे, और उससे एक कँपकँपाती आवाज़ निकली —“तू यहाँ क्यों आया, अर्जुन?”

उसका नाम….मूर्ति को अर्जुन का नाम कैसे मालूम? उसके रोंगटे खड़े हो गए। एक ठंडी हवा मंदिर के अंदर घूमने लगी। हर दीवार पर उकेरे गए तंत्र-मंत्र अचानक चमकने लगे, जैसे उनमें खून बह रहा हो। एक सड़ा हुआ गंध अर्जुन की नाक में चुभा — जैसे सैकड़ों आत्माओं ने एक साथ चिल्लाकर मदद माँगी हो।


अतीत की परछाइयाँ

अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और याद किए हुए सुरक्षा-मंत्र बोलने की कोशिश की, पर उसकी जुबान लड़खड़ा गई।
वह देख सकता था — मूर्ति की पीठ के पीछे, ज़मीन पर कोई औरत झुकी बैठी थी, गले में ताज़ा कटे निशान, आँखें फटी हुई। वह औरत अचानक बोली —“मैं अभी मुक्त नहीं हो पाई…”

उसका चेहरा धीरे-धीरे सड़ने लगा, जैसे कोई उसे जला रहा हो।अर्जुन ने घबराकर आँखें बंद कर लीं, पर कानों में चीखती आवाज़ें अब भी गूँज रही थीं। उसने किसी तरह अपनी साँसें संभालीं —“ये सिर्फ भ्रम है…”



उसने खुद को  समझाया। लेकिन तभी, मूर्ति की आँखों से एक काला साया निकला, जो रेंगता हुआ उसकी ओर बढ़ा — उस साये का चेहरा आदमी जैसा था, पर गर्दन इतनी मुड़ी हुई थी कि उसकी चीख सुनकर दीवारें तक थर्रा गईं। वो साया अर्जुन के ठीक सामने आया, और बोला —“तेरे गाँव की सारी बलि अधूरी थी, अब तेरा समय आया है…”


मंत्र का असर

अर्जुन काँपते हुए अपनी जेब से हल्दी की राख निकाली, जो पुजारी ने दी थी, और ज़ोर से एक प्राचीन श्लोक बोला।साया एक पल को पीछे हटा, जैसे उसे कोई गर्म चिंगारी लगी हो, मगर फिर और भयानक रूप लेकर सामने आ गया। मंदिर की छत से चमगादड़ों का झुंड गिरा, और उनका पूरा झुंड अर्जुन पर टूट पड़ा, उसने अपना चेहरा ढँक लिया, पर चमगादड़ मानो उसकी खाल तक चीर डालना चाहते थे। उसने जैसे-तैसे खुद को बचाया और एक कोना पकड़कर बैठ गया। वहाँ, जमीन पर एक टूटी हुई तांत्रिक माला पड़ी थी — काली मनकों की, जिनसे अजीब-सी सिसकियाँ निकल रही थीं। उसने वह माला उठाई, तो अचानक मंदिर की दीवार पर खुद ही रक्त से लिखा हुआ दिखा — “रक्त ही तेरा मार्ग खोलेगा।”



अर्जुन की आँखों में खून उतर आया — क्या इसका मतलब… उसे बलि देनी होगी? क्या इस मंदिर का रहस्य तभी खुलेगा जब वह अपनी ही देह का रक्त चढ़ाएगा?


अगले भाग की झलक

अब अर्जुन एक ऐसे मोड़ पर था जहाँ उसे खुद तय करना था — अपने खून से इस श्राप को तोड़े, या खुद उस श्राप का हिस्सा बन जाए? मूर्ति फिर बोली — “अब भागने का रास्ता नहीं है…”



👉 भाग 3 में जानिए — अर्जुन क्या करेगा? बलिदान या विद्रोह? और चन्द्रकोट मंदिर का असली राज़ आखिर क्या है?


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