चन्द्रकोट का श्राप: प्राचीन भारत की भूतिया कहानी - भाग 3

 🕯️ चन्द्रकोट का श्राप — भाग 3: अंतिम बलिदान


साँसों की आखिरी जंग

मंदिर का अंधकार अब अर्जुन को निगलने ही वाला था। मूर्ति के चारों ओर वह काला साया भयंकर रूप ले चुका था— उसके सिर से बहते काले तरल में मानो सैकड़ों आत्माएँ फँसी कराह रही थीं। मंदिर की दीवारों पर रक्त से बने मन्त्र जल रहे थे, जैसे किसी राक्षसी आग ने उन्हें जला दिया हो। अर्जुन का दिल फटने को था — उसने जितना साहस लाया था, सब खोता जा रहा था। उसके कानों में एक औरत की चीख गूँजी, 

“अगर तू बलिदान नहीं देगा, ये गाँव कभी नहीं बचेगा…”



अर्जुन काँपकर पीछे हट गया, पर तभी मूर्ति की आँखों में झिलमिलाता लाल प्रकाश उभरा — मानो अर्जुन की हर साँस को पी जाने को तैयार।


रक्त का सौदा

अर्जुन के दिमाग में जैसे बिजली चमकी — अगर उसे गाँव बचाना है, तो कोई न कोई बलिदान देना ही पड़ेगा। उसने अपनी कलाई पर नजर डाली और वहीं पड़ी टूटी तांत्रिक माला को कसकर पकड़ लिया। उसने खंजर उठाया जो मूर्ति के सामने रखा था, खून से सना हुआ और अपनी कलाई पर चोट की।



जैसे ही उसकी पहली बूँदें ज़मीन पर गिरीं पूरे मंदिर की दीवारें काँप उठीं। मूर्ति की आँखों में लाल ज्योति और तेज़ हो गई और वह काला साया तेज़ चीखकर अर्जुन की तरफ बढ़ा। मगर जैसे ही अर्जुन ने मंत्र दोहराया उसके खून ने मंदिर के भीतर जमी हुई शैतानी ऊर्जा को तोड़ना शुरू कर दिया।


राक्षसी विदाई

मंदिर में एक ज़ोरदार धमाका हुआ। अर्जुन ज़मीन पर गिर पड़ा। उसके चारों ओर लपटें और स्याह धुआँ गोल-गोल घूमने लगे।


उसने देखा।वह औरत — जिसकी आत्मा तड़प रही थी।अब उसके सामने खड़ी थी। हाथ जोड़कर बोली —

“तेरे बलिदान ने मुझे मुक्ति दी, बेटा… तुझे माँ काली आशीर्वाद दें…”

उसकी देह राख में बदल गई और काली मूर्ति में से वो काला साया भी चीखते हुए फट पड़ा। जैसे किसी ने उसे हज़ार टुकड़ों में बाँट दिया हो। मंदिर फिर सन्नाटे में डूब गया। सिर्फ अर्जुन की साँसें सुनाई दे रही थीं — धीमी, टूटी, मगर ज़िंदा।


नई सुबह

जब सूरज की पहली किरण मंदिर पर पड़ी। गाँव के लोग अर्जुन को वहाँ बेसुध पाए। उसके घावों पर सफेद निशान बन चुके थे — जैसे माँ काली ने खुद उन पर हाथ रखा हो। गाँववालों ने उस दिन पहली बार इतने वर्षों बाद मंदिर का दरवाज़ा खोला बिना किसी डर के।



श्राप टूट चुका था पर अर्जुन की आँखों में हमेशा के लिए वो रात दर्ज हो गई थी — वो चीखें, वो साया, और वो रक्त का सौदा कभी नहीं भूल पाएगा।


निष्कर्ष और रहस्य की एक झलक

आज भी, अगर कोई चन्द्रकोट गाँव जाता है। तो मंदिर में अर्जुन के बलिदान का वह निशान पत्थरों पर उभरा दिखता है। लोग कहते हैं — “जिसने उस रात मौत को हराया, वही सच्चा योद्धा था।”  पर अर्जुन अब भी कभी-कभी सोचता है — 

“क्या सचमुच वह साया खत्म हो गया? या सिर्फ एक नई शिकार की प्रतीक्षा में कहीं और चला गया?”




# चन्द्रकोट का श्राप: प्राचीन भारत की भूतिया कहानी 

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